एक विश्वास

एक विश्वास, दुनिया के बदलने का।

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Ashok Srivastava


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पार्टी या स्वार्थ देशहित पर भारी

Posted On: 18 Jun, 2017  
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खबरों के आइने में

Posted On: 14 Jun, 2017  
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सारा देश अकर्मण्य हो गया है

Posted On: 12 Jun, 2017  
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तेरी देशभक्ति मेरी देशभक्ति

Posted On: 5 Jun, 2017  
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गजल

Posted On: 31 May, 2017  
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ये एक ज्वलंत समस्या है

Posted On: 30 May, 2017  
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कविता

Posted On: 30 May, 2017  
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कविता

Posted On: 24 May, 2017  
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अवसरवाद

Posted On: 23 May, 2017  
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गजल

Posted On: 22 May, 2017  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

हमारा राष्ट्र विविधताओं से ही नहीं अनावश्यक आशंकाओं और अनैतिक आकांक्षाओं से लबरेज़ है। स्वार्थपरता के लिए तो पूरे विश्व में कोई हमारा सानी नहीं है। देश को अपने हित के लिए हम नीलाम भी कर सकते हैं यह बात सारा विश्व जानता है। ये कभी सही मुद्दे पर बात नहीं करते हैं। कभी किसी मुद्दे पर बोलेंगे भी तो बयान विवादित ही होगा। बस सब कुछ वोट औए नोट की खातिर्। यही वजह है कि आजादी के बाद के छः दशक बीतना हमारे लिए कोई संकल्प लेने का दिन आज तक नहीं लेकर आ पाया। ना जाने कितनी ऐसी बातें हैं जो सीधे हमारे स्वाभिमान से जुड़ी है और उनके लिए हम दृढ़ प्रतिज्ञ आज तक नहीं हो पाए मानो स्वाभिमान कोई सड़ी गली वस्तु हो ................अशोक जी सही दिशा मे सोचा है आपने । यही है इस देश की सच्ची तस्वीर । हिँदी के लिए अभी भी पखवाडा मनाने की जरूरत समझी जा रही है । इससे दयनीय हालत और क्या हो सकती है । सच तो यह है इस देश मे राष्ट्रीय भावना सिर्फ कहने और दिखावे की चीज बन कर रह गई है - 26 जनवरी, 15 अगस्त, 2 अक्टूबर, आदि अवसरों पर यह तमाशा देखा जा सकता है ।

के द्वारा: एल.एस. बिष्ट् एल.एस. बिष्ट्

के द्वारा: pkdubey pkdubey

अशोक सर आपने पश्नपत्र हमारे सामने रख्खा है कोशीश करुन्गा हर सवाल का जवाब ठिक से दे सकुं । (१) आपने विरोध का सारा दोष मिडिया पर लगाया है । में आपकी बात लोगों तक पहुंचा लेता हुं -- दोस्तों, अब मिडिया मे मत जाओ, सिधे पेट्रोल पम्प ही जला दो । आप के जैसा कोइ बिचमें आता है तो उसे भी जला दो-- - (२) रही बच्चों की, ओफिस की बात ----आप खूद सायकल चलाना जानते हो ? सब सायकल चलायेंगे तो पेट्रो-कम्पनियां क्या खायेगी, घास ? (२) सबसिडी तो सांपसिडी है ना । जनता को उल्लु बनाने का औजार ? एक लिटर पर ४३ रुपिया टेक्ष ले लो फीर २ रुपया सबसिडी के नाम से भीक में दे दो, सिर्फ एहसान जताने के लिये । (३) सर आप को क्यों तरस आता है, आप ईतने दयावान तो नही दिखते । मुर्गा यदि आपके पास से गुजरेगा तो उस की खैर नही, और तरस की बातें ? (४) सर, सार्वजनिक वाहन पानी से नही चलते हैं । अच्छा हुआ आपने अठ्ठारह साल के निचेवालों को ये सवाल नही किया । (५) सर, मेहन्गाई सब को परेशान करती है । आप को पगार कम पडने लगी है, तभी तो आप भी बरसाती मेंढकों की भाँति टर्टराने के लिए मजबूर है, कुछ तो मिलेगा ईस मेहनत से । चुनावी मौसम है तो सरकार को भी मेहंगाई की वजह से ज्यादा रुपिया चाहिए । मिडिया को खरिदना है, आप जैसों की एक फौज बनाना है, उसमें भी पैसे लगेंगे, चुनाव आयोग के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों को खरीदना है, ताकी २००९ की तरह वोटिन्ग मशीन के आकडे उन के पक्ष में पढे जा सके । आप के नेता सायकल में तो कहीं नही जाते, विमान का भाडा भी निकालना है । (६) आप का आखरी सवाल ऐसा है की ईस का जवाब बहुत घटिया है । --और यदि काँग्रेस के साथी दल वास्तव में यह विरोध सैद्धांतिक रूप में और ईमानदारी से कर रहे हैं तो आज तक किस मजबूरी में उसे वे समर्थन जारी रखे हुए हैं। -- ये गठ-बन्धन वाला सवाल रोड पर खडे बच्चे ही दे सकते है जो दो श्वानों का गठ-बन्धन देख रहे है, देख रहे हैं कब ये श्वान अलग होंगे । २०१४ तक तो कोइ नही ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

अशोक जी ; जय हिंद ! सर्वप्रथम पिछली तीक्ष्ण व सीख देने वाली प्रतिक्रिया के बिना कोई लाग लपेट के लिए क्षमा प्रार्थना करता हूँ ! आपके इस लेख का शीर्षक मात्र देख पहली बार अपनी सार्वजनिक खिंचाई होने का डर लगा किन्तु आपके संयत शब्दों को पढ़ आपके प्रति श्रद्धावनत होने से स्वयं को नहीं रोक सका ! मेरे शब्द कभी इतने हलके नहीं होते जितने उस दिन दो तीन ब्लोगों पर प्रतिक्रिया में मैंने लिखे ! शायद व्यक्तिगत तनाव कलम को प्रभावित करने का कारण बना हो , इसीलिये क्षमा ! जैसा आपने स्वयं इस लेख में पूर्वाग्रह रहित सोच के विकास को समर्थन दिया है केवल वही मेरा भी आशय है ! मेरे मत में ना तो कांग्रेस ना भाजपा ना ही कोई अन्य राजनैतिक दल ,ना आप ना में ना ही कोई भी अन्य जो इस पृथ्वी पर जन्मा है , ना रात ना दिन ना ही कोई भी प्रहर ,ना शरद ना ग्रीष्म ना ही कोई भी अन्य ऋतू ,ना भूत ना भविष्य ना ही वर्तमान में से कोई भी ऐसा हो जिसका केवल नकारात्मक अथवा सकारात्मक मात्र एक ही पक्ष होता हो ! ये केवल हम ही हैं जो किसी भी व्यक्ति, वस्तु, स्थान ,दिशा, दल अथवा किसी भी विद्यमान या अविद्यमान के प्रति एक पूर्वाग्रह पूर्ण सकारात्मक अथवा नकारात्मक विचारधारा धारण कर लेते हैं और बस यही वुद्ध्जीवियों से अनपेक्षित रहता है [ और रहना भी चाहिए ]! आगे कुछ नहीं अन्यथा अगली बार फिर क्षमा प्रार्थना करनी पड़ेगी जो मेरा पूर्वाग्रही मन मुझे करने से रोकता है !क्या करूं आखिर मैं भी एक इंसान ही तो हूँ !

के द्वारा: Charchit Chittransh Charchit Chittransh

गाँधी और नेहरु को कितना पढ़ा और सुना है आपने ? शायद एक भी निरपेक्ष लेखक की इनपर लिखी कोई भी रचना नहीं ! गाँधी और नेहरु दोनों ही अभिजात्य परिवारों में जन्मे थे किन्तु दोनों का केवल रहन सहन का परिवर्तन ही उदाहरण स्वरुप ले लें तो भी आप और हम उनकी इसमें भी बराबरी नहीं कर सकते ! जब उन जैसे वस्त्र पहनना ही हमारे बस का नहीं तो उनके विचारों तक पंहुचाना दो बहुत दूर की कौड़ी है !महोदय ऐसी बेतुकी विध्वंसक धारणाओं के प्रसार के लिए आपने गलत मंच चुना है ! यहाँ लिखने वाले और पढ़ने वाले दूसरों के विचारों के अन्धसमर्थक अथवा अंधविरोधी नहीं हैं ,उनकी अपनी निजी विचारधारा है जो उनके विस्तृत अध्ययन के परिणामस्वरूप उपजती है ! क्षमा कीजिये किन्तु गांधी नेहरु के योगदान बिना स्वतंत्रता प्राप्ति के यज्ञ में असंक्ष्य भारतीयों की आहुति के बाद ही /भी स्वतंत्रता प्राप्ति संदिग्ध होती ! हाँ उनके उत्तराधिकारियो का किसी राष्ट्रप्रेम या मात्रभूमि से कोई अनुराग नहीं वे केवल कुर्सी के आसक्त हैं !बात भ्रष्टाचार के दोषियों को सजा की निश्चय ही होनी चाहिए किन्तु इसमें उनके पूर्वज कहाँ से दोषी ठहराए जा सकते हैं ?

के द्वारा: Charchit Chittransh Charchit Chittransh

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