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शिक्षा की दुर्दशा

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भारत में जब “शिक्षा का अधिकार अधिनियम” लागू किया गया तो लगा कि एक अच्छा कदम उठाया गया है जिससे देश में शिक्षा जगत में अभूतपूर्व परिवर्तन होगा जो हमारे समाज को हर दृष्टि से जागरूक बनाएगा और देश को विकसित व सभ्य राष्ट्र की पहचान भी दिलवाएगा। यह अधिनियम भी “सूचना का अधिकार अधिनियम” की भाँति भ्रष्ट नौकरशाही की भेंट चढ़ जाएगा यह तो शायद ही किसी ने सोचा होगा। जिस देश में ईश्वर या खुदा को लोग भ्रष्टाचार का अंग बना लेते हैं वहाँ यह बात नहीं सोची गई यह कैसे हुआ पता नहीं परन्तु यह सच है कि यह अधिनियम जो शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए और सर्व शिक्षा का मूल मंत्र बनाने के लिए लागू हुआ यह मात्र पैसे की लूट का माध्यम बनकर रह गया।
यह अधिनियम निजी शिक्षण संस्थानों ने या तो लागू ही नहीं किया या इसकी आड़ में खुला भ्रष्टाचार किया। कोई बड़ी बात नहीं कि यह सब शिक्षा माफियाओं और सरकारी अधिकारियों की पुरानी चली आ रही जुगलबंदी के कारण हुआ हो। खैर हुआ चाहे जैसे हो परन्तु यह हुआ है इस बात में तो शक की कोई गुंजाइश नहीं ही है। यह जो अधिनियम लाया गया इसको भी आरक्षण के कानून की तर्ज पर बरबाद किया गया। यहाँ पर जो गरीबों के लिए काम किया जाना था या जो फायदा गरीबों को पहुँचाया जाना था वो हमारे भ्रष्ट तंत्र ने अमीरों के मुँह में डाल दिया और कमीशन के दम पर सबकुछ हजम हो गया तथा किसी ने डकार तक नहीं ली। शिक्षा का अधिकार अधिनियम भ्रष्टाचार करता रहा और बेचारा सूचना का अधिकार अधिनियम कमीशन में हिस्सा ले कर लाचार बना सबकुछ देखता सुनता रहा। बेचारा बेजुबान और कर भी क्या सकता था?
देश का दुर्भाग्य है कि जो कलम पकड़ना चाहते हैं हमारा कानून उन्हें वंचित रखता है और जो कलम की जगह हथौड़ा पेंचकस से लेकर चाकू तलवार तक पकड़ने को बेताब हैं उन्हें जबरन यही कानून किताब पकड़वाता और फड़वाता है। जिस देश में शिक्षा की देवी भी हैं और उनकी पूजा भी होती है उसी देश में शिक्षा व देवी का जैसा अपमान देश के ही लोग कर रहे हैं वैसा तो अन्यत्र कहीं नहीं मिलेगा। RTE अर्थात Right To Education को Right To Eat बनाकर रख दिया है। मिड डे मील बच्चे से प्रधान तक के लिए भोजन और गणवेश तथा पुस्तक पुस्तिकाओं को बाँटने के नाम पर सबको कमीशन, जबरदस्त लूट की व्यवस्था है।
यहाँ सारा अधिकार बच्चे व उनके अभिभावकों के पास है और बचा खुचा प्रशासन के पास। यही लोग तो इस व्यवस्था के राजा या राजकुमार हैं। यहाँ सभी को कुछ ना कुछ अधिकार मिले हैं अगर किसी को कुछ नहीं मिला है तो वह है शिक्षक जो पूरी तरह से गुलाम बना दिया गया है। जाने क्यों सरकार को समझ नहीं आता कि गुलाम तो गुलाम ही पैदा करेगा। शायद समझ तो सब आता है इसीलिए तो संतान मोह में शासन प्रशासन कुछ अच्छा सोच नहीं पाता और साजिशन नीतियों में छेद कर देता है ताकि अपने बच्चों को बेहतर भविष्य दे सके।
शिक्षा के क्षेत्र को कुछ इस तरह का बना दिया है कि जैसे स्कूल टीचर कोई टीचर नहीं बल्कि आया हो और अभिभावकों का काम तो मात्र बच्चे पैदा करना है जिन्हें ये शिक्षक अपनी व परिवार की इज्ज़त तथा भविष्य दाव पर लगा कर भली भाँति पालें तथा पोसें जिससे कि आया यानी शिक्षकों की नौकरी सही सलामत चलती रहे, सच हमारी सरकार और अभिभावक बहुत पुण्य का काम कर रहे हैं। कितने ही घरों के चूल्हे बुझ ही जाएंगे यदि लोगों ने बच्चे पैदा करने बंद कर दिए। जिस देश में जनसंख्या नीति, शिक्षा नीति और कृषि नीति ठीक नहीं होती वह देश तबाह ही होता है और हमारे साथ कुछ ऐसा ही होगा। विद्यालयों में शासन प्रशासन व अभिभावकों का दखल इतना बढ़ गया है कि सबकुछ चौपट होने की कगार पर है परन्तु विडंबना कि कोई यह मानने को तैयार नहीं बस सभी को कमी अध्यापकों में ही नजर आ रही है। कोई यह सोचने समझने को तैयार नहीं है कि हमारी सामाजिक संरचना और सोच इतनी विकृत हो चुकी है कि जबतक इसपर चोट ना हो और सुधार ना हो तबतक शिक्षा के क्षेत्र में किसी परिवर्तन या भलाई की बात सोचना भी बेमानी ही होगी।
देश के आभिजात्य वर्ग की नेहरू गांधी के समय से चली आ रही भाषा संबंधी साजिश का कोई अंत नजर नहीं आ रहा हैं। हमारे देश के गुलाम तथाकथित बड़े व संपन्न लोग अपने बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा दिलवाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। ये लोग देश के सामान्य जनमानस से अपने बच्चों को अलग रखने के लिए उन्हें पैदा होते ही अंग्रेजी का गुलाम बना देते हैं और समाज में अंग्रेजी को सम्मान का प्रतीक चिह्न स्थापित करते हैं। ये संतान मोह में वो अंधे हैं जो अपनी भाषा का अपमान करते हैं ताकि दूसरे लोग खुद को हीन समझें। क्यों नहीं हमारे नीति नियंता इंग्लैंड या अमेरिका के स्वीपरों को बुला कर प्रशासकीय कार्य सौंप देते क्योंकि उनसे अच्छी अंग्रेजी तो भारतीय नहीं ही बोल सकते हैं।
मुझे समझ नहीं आता कि हमारे देश के कर्णधारों ने कभी यह क्यों नहीं सोचा कि हम अपनी चीजों का और कुछ नई चीजों का विकास ऐसे करें कि लोग हमारे सामने हाथ फैलाएँ ना कि हम उनके सामने और बाहर से लोग हमारे पास आएँ और हमसे सीखने के लिए हमारी भाषा सीखें जैसे कभी मैक्समूलर ने और शायद अल् बिरूनी ने किया था परन्तु ये ऐसा कर नहीं सकते थे क्योंकि तब इनकी साजिश सफल नहीं होती और ये सभी संभवतः मिट भी चुके होते।
जो देश अपनी भाषा से परहेज करे जहाँ भाषा के नाम पर दंगे हों जहाँ शिक्षा में धर्म घुस जाए जहाँ शिक्षा राजनीति पढ़ाए बाद में परन्तु राजनीति की शिकार पहले हो जाए वहाँ शिक्षा कभी अपने उद्देश्य की पूर्ति कर ही नहीं सकती है। जहाँ नीति निर्धारक खुद देश की परिस्थितियों से अपरिचित हैं वो देश को अच्छी शिक्षा नीति दे ही नहीं सकते। यहाँ तो अधिकारी विदेशी दौरे ऐशोआराम के लिए करता है और लौटता है तो वहाँ से घासकूड़ा उठाए चला आता है क्योंकि उसको अपनी यात्रा का औचित्य सिद्ध करना होता है। अब जब कुछ लाया गया है तो फिर बिना सोचे समझे उसको लागू भी करना होगा क्योंकि उसको सिद्ध करना है कि वो कितना कर्मठ है पर दुर्भाग्य से यही कर्मठताएँ ही देश को डूबने पर मजबूर कर रही हैं।

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