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किस करवट बैठेगा ऊँट?

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आज ३० दिसंबर २०१६ का दिन मुलायम और अखिलेश की सांप्रदायिक तथा परिवारवादी राजनीति की जीत का दिन है ऐसा मुझको प्रतीत हो रहा है। वैसे निश्चित रूप से यह कह पाना कठिन है कि मुलायम की चाल हर हाल में सफल ही होगी परन्तु उत्तर प्रदेश के संदर्भ में तो यह सही ही लग रही है क्योंकि यहाँ की लोभी और स्वार्थी तथा जातिव्यवस्था की पक्षधर जनता खास कर युवा जो कहने को तो खुद को आधुनिक कहते हैं जबकि लगते वो पिछड़ों से भी पिछड़े और दलितों से भी दलित हैं। मुलायम एंड कम्पनी ने इन्हीं के वोटों के दम पर यह खेल खेला है इसीलिए मुझे मुलायम की चाल सफल नजर आ रही है। याद कर लीजिए २०१२ की चुनाव पूर्व की चुनावी चालबाज़ी की घोषणाएँ। बाकी तो सब जनता के हाथ में है जिसका कोई भरोसा नहीं कि कब किस करवट बैठ जाय या किस बात पर किसकी गोद में बैठेगी या किसकी गोद से कूदकर भाग जाएगी।

शिवपाल जो मुलायम के अनुज हैं और सपा की राजनीति के मुलायम के बाद उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक कद्दावर नेता भी अवश्य ही मुख्यमंत्री की कुर्सी को २०१२ से ही टकटकी लगाए देख रहे होंगे और उसे पाने के लिए जोड़ तोड़ भी कर रहे होंगे परन्तु मुलायम ने पुत्र मोह में कुर्सी को विरासत या उत्तराधिकार की वस्तु बना दिया जो कि लोकतंत्र में नहीं होना चाहिए परन्तु हम यह न भूलें कि भारत में किताबों को छोड़ कर कहीं और लोकतंत्र देखने को नहीं मिला है और इसका भी दोष उस जनता पर ही है जिसने आज तक अपनी गुलाम मानसिकता त्यागी नहीं है। कुर्सी का हकदार तो शिवपाल ने खुद को ही माना होगा परन्तु जब कुर्सी किसी और ने छीन ली तो क्या उनको बुरा नहीं लगा होगा? जरूर ही लगा होगा और विरोध भी उन्होंने निश्चित रूप से दर्ज करवाया होगा। अब जैसे तैसे लीपापोती कर बात बनती रही होगी परन्तु फिर से चुनाव आने पर तो सबकुछ बदल जाता है तो यहाँ भी वही हुआ और नए परिदृश्य में सब कुछ नया हो रहा है पर हो वही रहा है जो मुलायम की नीयत में है अर्थात शिवपाल को किनारे कर अखिलेश को सदा सदा के लिए अपना उत्तराधिकारी बना देना जो आज मुलायम ने यह कर दिया।

मुलायम का पुत्र मोह न होता और वो शिवपाल को योग्य मानते तो २०१२ में ही उन्हें मुख्यमंत्री बना सकते थे परन्तु मुलायम को तो किसी भी कीमत पर यह नहीं करना था तो उन्होंने नहीं ही किया और अब तो यह करने का प्रश्न ही नहीं उठता है। मुलायम को पार्टी भी बचानी है और पुत्र को भी विरासत सौंपनी है वो भी बिना किसी संकट के। तो इससे आसान रास्ता भला हो भी क्या सकता है कि भाई जो पहले से ही कुंद है उसे कुंदन कहकर और ग़फलत से भर दो और सबको दिखाओ कि मुलायम को पुत्र मोह नहीं है वो तो भाई के लिए पुत्र को भी छोड़ सकते हैं। वाह कमाल की सोच और निकृष्टतम चाल मगर राजनीति के लिए सर्वोत्तम कि साँप भी मर जाएगा और लाठी भी बच जाएगी। जनता ने कभी राजीव गाँधी को (१९८४) बिन माँ के बेटे के रूप में देखा था और प्रचंड बहुमत से सत्ता सौंप दी थी। तो आज अखिलेश को जनता बाप के अत्याचार का शिकार समझ सत्ता क्यों नहीं सौंप सकती? वैसे शायद अब जनता इतनी मूर्ख या भोली न रह गई हो?

मुलायम ने सोचा तो यही होगा कि बेटे को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना खतरनाक व बगावत लाने वाला हो सकता है इसलिए कोई चालाकी की जाए। भाई के साथा लुकाछिपी का खेल खेला जाए। भाई भी झाँसे में आ गया है। एक भाई के साथ चाल और एक के साथ दिखावे का बवाल जिसमें रामगोपाल जीतते और शिवपाल हारते नजर आ रहे हैं। अब देखना ये है कि जनता का फैसला क्या होता है। जनता को अपराध युक्त या मुक्त प्रदेश में से एक को चुनना है। यह कोई नहीं कह सकता कि अखिलेश चोरी, डकैती, कत्ल, बलात्कार, फिरौती, सांप्रदायिक दंगे आदि पर रोक लगा देंगे क्योंकि सपा के साथ या अखिलेश की युवा टीम में हैं कौन लोग यह सबसे अहम सवाल है। इस सवाल का जवाब तो हर किसी को पता है। किसी को कुछ कहने की आवश्यकता ही कहाँ है? वैसे तो सभी पार्टियों के साथ वही हैं जिनको पढ़ने लिखने के सिवा बाकी हर काम से मतलब है परन्तु सपा में शायद सिर्फ ऐसे ही लोग भरे गए हैं।

मैं फिर कहूँगा कि मुलायम की चाल बिलकुल सटीक है। बेटा जनता की सहानुभूति लेकर चुनाव जीत जाय तो सोने पे सुहागा और न जीते अकेले के दम पर मगर चाचा भतीजे मिलकर सरकार बना लें तो भी कुर्सी घर की, मतभेद तो होते रहते हैं। यह असंभव भी नहीं है क्योंकि चाचा को फिर कुछ लालीपाप देकर मनाया जाएगा तो कुछ शर्तों पर सुलह हो ही जाएगी आखिर दूसरा रास्ता भी क्या बचेगा? और अगर कोई सूरत न बचे सरकार बनाने की तो किसी के साथ गठजोड़ कर के सत्ता सुख भोग लो। यह तो निश्चित ही है कि आज की तारीख़ में चुनाव लड़ने की कुव्वत अखिलेश में नहीं है। कालेधन का जमाना और था। भले ही पूरी तरह से कालेधन पर रोक न लग पाए परन्तु परिस्थितियाँ तो कठिन हो ही गई हैं। राह आसान नहीं है और चुनाव लड़ना बच्चों का खेल भी नहीं तो मैं कैसे मान लूँ कि यह सब खेल नहीं या चालबाज़ी या चालाकी नहीं या जनता को मूर्ख बनाने की रणनीति नहीं है। बेशक यह सपा द्वारा अपने गुनाहों पर पर्दा डालने की कोशिश है अपने या अपनों के द्वारा किए गए अपराधों से लोगों का ध्यान भटकाने की कोशिश है यह सब और कुछ नहीं।

अंत में फिर कहूँगा कि है तो सब कामचोरी आरामखोर यानी कि मुफ्तखोर जनता के ही हाथ में। और देखना यही है कि क्या जनता ने स्वार्थ त्याग सीख लिया है या फिर अभी भी तात्कालिक लाभ के लिए पुनः पाँच वर्षों की जलालत ही मोल लेना चाहती है।

३०/१२/१६

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