एक विश्वास

एक विश्वास, दुनिया के बदलने का।

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बिगुल बज गया है

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सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि चुनाव में जाति-धर्म के नाम पर वोट नहीं माँगे जाने चाहिए और चुनाव आयोग कहता है कि जिसके बिजली पानी या फोन बिल बाकी है वो चुनाव नहीं लड़ सकता। दोनो ही संवैधानिक संस्थान हैं। मैं आम में भी आम तो क्या मुँह खोलूँ। जानते तो सब हैं कि क्या करते हैं नेता या पार्टियाँ और कैसे होते हैं चुनाव। जिसपर दो चार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष मुकदमे न हों वो कैसा नेता और बिना चार छहः मुकदमे के कौन है जो जीत का हकदार बने। मंत्री बनने की शर्त भी समझ ही गए होंगे। जिस देश में सभी राजनैतिक पार्टियाँ काले धनबल से चुनाव लड़ती या लड़ाती हों और जनता धन धर्म तथा जाति के नाम पर या किसी खानदान पर आस्था के नाम वोट देता है वहाँ कोई एक या दो अच्छे नेता या कोई एक व्यक्ति किसी संवैधानिक पद पर बैठ कर अकेले क्या कर पाएगा?

चुनाव की प्रक्रिया की शुरुआत हो चुकी है। मुद्दों की बात क्या करेंगे। सब जानते हैं कि वोट जाति धर्म या किसी और लालच तथा स्वार्थ के नाम पर क्रय-विक्रय की वस्तु मात्र बनकर रह जाएँगे। भारत में चुनाव योग्यता या गुण-दोष के आधार पर तो लड़े ही नहीं जाते हैं। सब एक दूसरे की बुराई बताकर वोट मांगते हैं अगर दूसरे की बुराई बताकर वोट माँगना गुण दोष की श्रेणी में आता है तो बात अलग है। मैं तो यही मानता हूँ कि गुण दोष की बात तभी होनी चाहिए जब सभी हर मुद्दे पर अपनी तुलना अपने विरोधी से कर के वोट माँगें।

इस देश में विकास की बात तो करना ही पिछड़ेपन की निशानी है और देशप्रेम हद दर्जे का कुकर्म है। जिस देश में लोग अपनी माँ को सम्मान नहीं दे सकते वो भारत माता को तो पहचानेंगे भी नहीं और हम यह सब देख भी रहे हैं। सारे निकृष्ट यही कहते हैं कि कोई उनको देशप्रेम का पाठ न पढ़ाए परन्तु वो खुद दूसरों को पढ़ाते नजर आते हैं। विडंबना यही है कि सब दूसरे को देशभक्ति सिखाते है पर जब अपनी बारी आती है तो कुतर्कों के सहारे वैतरणी पार करने की कोशिश करते हैं और दुर्भाग्य देश का कि वो सफल भी हो जाते हैं क्योंकि जनता जो खेमों में बँटी स्वार्थ का झूला झूल रही है वो साथ खड़ी हो जाती है। मैं तो समझता हूँ कि ७०-८०% वोटर तो ऐसा ही होगा जो सदा सर्वदा के लिए कहीं न कहीं से खुद को जोड़े बैठा है। बचे हुए २०-३०% में वो हैं जो समय या सामयिक मुद्दे को देखकर अपने नफे नुकसान को देखते हुए मतदान करते होंगे। शायद यही वो मतदाता हैं जो अधिक संख्या में जिसके पक्ष में चले जाते हैं उसकी विजय की इबारत लिख जाती है। ये मतदाता शायद हर चुनाव में अपनी आस्था बदलते रहते हैं क्योंकि इनकी इच्छा की पूर्ति कहीं हो नहीं पाती और ये आशाओं की डोरी थामें सारी जिंदगी पेंडुलम बने रहते हैं या फिर मतदान से ही मुँह मोड़ लेते हैं।

मतदाताओं की करनी का ही फल है कि क्षेत्रीय दलों के दलदल में देश जकड़ा हुआ कराह रहा है यहाँ तक कि वास्तव में जो राष्ट्रीय दल हैं वो भी गिरी हुई राजनीति की शिकार हो चुकी हैं। जनता अपना भला चाहती है यह बुरा नहीं है बुरा यह है कि सिर्फ अपना ही भला चाहती है और किसी भी कीमत पर चाहती है। आज अपराधी चुनाव लड़ रहे हैं, विधायक व सांसद रिश्वत ले रहे हैं और नक्सलवाद तथा आतंकवाद का समर्थन कर रहे हैं क्यों? यह सारा दोष जनता की स्वार्थी प्रकृति व प्रवृत्ति का ही है, मैं तो यही मानता हूँ।

मुद्दों की कमी नहीं है परन्तु कोई मुद्दों को पूछता कहाँ है। सड़क पानी बिजली तो सब की जुबान पर रहता है परन्तु चुनाव के समय यह किसे याद आता है। वैसे असली मुद्दे तो तीन नीतियों के इर्द गिर्द ही होने चाहिए जो कृषि शिक्षा जनसंख्या के संबंध में होनी चाहिए परन्तु किसे यह सब दिखता है। पढ़ाई से किसी को मतलब कहाँ है क्योंकि बिना पढ़े ही धनवान बनने के धंधे मिल जाते हैं और कमाई होती है तो मंहगाई कहाँ दिखती है। गरीब तो हैं ही कीड़े मकोड़े यह अमीर ही नहीं खुद गरीब भी मानता है।

मुलायम खानदान की नाटकबाजी को सभी ने एक तरफ नूरा कुश्ती की संज्ञा दी तो दूसरी तरफ टकटकी बाँधे रहे कि कुछ फायदा ही उठा लें। नोटबंदी में सारे विपक्षी पहले तो समझ ही नहीं पाए कि आखिर कहें क्या फिर जनता की परेशानी का बहाना बनाकर हमले शुरू कर दिए। किसी दल या नेता ने यह नहीं कहा कि वो परेशान लोगों की मदद करेंगे बस फायदे के लिए भारत बंद का आयोजन कर लिया परन्तु किसी ने यह नहीं सोचा कि आखिर यह नौबत आई ही क्यों? अगर पूर्ववर्ती सरकारों ने घोटाले न किए होते तो आज देश के हालात यहाँ तक पहुचते ही नहीं। कांग्रेस जो आज अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है कभी चिंतन तो करे कि उसकी यह हालत हुई क्यों? क्या वो खुद है जिम्मेदार इसकी या फिर कोई और? कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए सत्ता सुख भोगा और इसके लिए सरकारी तंत्र का दुरुपयोग किया तथा उद्योगपतियों का दोहन किया जिसके दुष्परिणाम हम आज तक भोग रहे हैं। कांग्रेस से यही सब अन्य सभी दलों या नेताओं ने सीखा और सभी बड़ी चालाकी से जनता को बेवकूफ बनाकर आज मजे लूट रहे हैं।

वंशवाद या परिवारवाद की दुहाई देनेवाले आज खुद उसी मकड़जाल में फँसे हैं। यह भी कांग्रेस से ही यह अवगुण अन्य ने लिया है और दुर्भाग्य से जनता ने नए ठिकाने तलाशने के चक्कर में आज हर तरफ नई नई जाने कितनी कांग्रेसें खड़ी कर दी है खुद को लुटवाने के लिए। नेहरू के बाद शास्त्री जी प्रधानमंत्री बने उनके बाद कांग्रेसियों ने इंदिरा गांधी को चुन लिया क्यों? कांग्रेस नेहरू खानदान के अलावा न खुद कुछ सोच पाई न ही देश को सोचने दिया। आज उप्र में मुलायम के लिए भी वैसा ही जनता ने किया है। बेटा अपने बाप को ही ललकार रहा है और जनता यह नहीं कह रही है कि जो बाप का नहीं हो सका वो हमारा क्या होगा? सोचिये कि यही जनता अपने घर देखना चाहेगी या कहेंगी कि उसका बेटा ठीक कर रहा है। यही है चरित्र हमारे देश का जिसकी वजह से हम भोग रहे हैं और भोगते रहेंगे तबतक जबतक कि सब नष्ट नहीं कर लेंगे।

कोई दलित के नाम पर कोई पिछड़े के तो कोई अल्पसंख्यक के नाम पर जान दे रहा है परन्तु किसी ने नहीं सोचा कि जिस मायावती की चप्पल प्लेन से मगाई गई और करोड़ों का बैंक बैलेंस हो गया उसने कितनों को दलित वाली स्थिति से बाहर निकाला है। माया या पासवान सरीखे लोग या पुनिया या कुछ अन्य जो पहले से ही आगे बढ़ गए हैं उनके अलावा किस दलित को कोई फायदा मिला है। किसी को आरक्षण का फायदा बार बार और किसी के लिए आरक्षण अनाधिकार यही है सामाजिक न्याय? यही सब मुलायम ने या लालू ने पिछड़ों के साथ किया या मुस्लिम नेताओं ने अन्य मुसलमानों के साथ किया परन्तु देश के छिन्न भिन्न हो चुके विकृत तानेबाने ने सबकुछ बरबाद कर रखा है। लोगों को गुमराह कर रखा है। जनता कब समझ सकेगी यह सब? सरकारें जनता को आर्थिक सहायता या सब्सिडी के नाम पर बेवकूफ बनाती है बल्कि यह कहना अधिक उचित है कि जनता को अकर्मणय बना रही है क्योंकि उसे पता है कि पैसा उसकी जेब से नहीं करदाताओं की जेब से जा रहा है। करदाताओं का पैसा समाप्त होगा तो कटोरा लेकर आईएमएफ या वर्ल्ड बैंक या किसी अमीर देश के सामने खड़े हो जाएँगे क्या फर्क पड़ेगा? जब भारत गुलाम था तब भी आम जनता ही पिसी थी आज भी वही पिस रही है और आगे भी उसी को पिसना है क्योंकि अमीर का तो जाति धर्म या आस्था विश्वास सब समय के साथ बदल जाता है अगर यह सब किसी का नहीं बदलता है तो बस आमजन का।

तो जनता को सोचना व समझना दोनो ही सीखना पड़ेगा अगर वो अपना भविष्य सुधारना चाहती है वरना दुर्दशा अभी और होनी है। अभी तो कष्ट व अपमान के कितने ही भाग और देखने बाकी हैं। उनमें जो कुछ होगा उसकी तो शायद कोई कल्पना भी नहीं कर पाएगा।

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