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सच : जो सुना न गया

Posted On 11 Jan, 2017 में

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देश का यही तो दुर्भाग्य रहा है कि यहाँ सच जानने की फुर्सत किसी मिली ही नहीं या फिर कभी किसी ने जान भी लिया तो उसे ऊँच नीच या छोटे बड़े या अमीर गरीब के आधार पर वहीं दफना दिया और न्याय होने नहीं पाया। कभी लिंग के आधार पर तो कभी जाति धर्म के और कभी पद या ओहदे के कारण तो कभी धन या बाहुबल के नाम पर न्याय का गला घुट गया। न्याय भारत में न कभी हुआ न आज हो रहा है। प्राचीन कहानी किस्से हमने भी बहुत सुने हैं परन्तु वो आदर्श तो शताब्दियों पहले हम अन्याय के नाम पर और झूठी शान या ऐशोआराम के लिए कुर्बान कर आए हैं। उनकी बलि दे आए हैं और अब तो उनके अवशेष तक कहीं नजर नहीं आते हैं।

देश में जब राजतंत्र था तब भी और आज प्रजातंत्र है तब भी परिस्थितियों में कोई अंतर नहीं हुआ है। कल के राजा या आज के नेता और अधिकारी सब हैं तो एक ही, आखिर बदला क्या है सिवाय नाम के? जो तानाशाही गुंडागर्दी और अन्याय अर्थात जोर जबरदस्ती पहले राजा करता था, आज वही सब नेता और अधिकारी कर रहे हैं। आजादी के सत्तर वर्षों बाद हम चिंतन करें कि हमने क्या पाया है तो यही देखेंगे कि जो हमसे पिछड़े थे वो भी हमको आज बहुत पीछे छोड़ गए हैं। हम तो जिस हाल में थे वहाँ भी नहीं टिक सके। यहाँ नेताओं और अधिकारियों ने जिस तरह की लूट मचाई उसने हमें कहीं का नहीं छोड़ा। सन् सैंतालीस में डालर और रूपये की कीमत बराबर थी और आज डालर रूपए के मुकाबले सत्तर गुणा मंहगा है। जब हमारे नेता और अधिकारी देश लूट रहे थे तब हमें कुछ पता ही नहीं था क्योंकि हम अनपढ़ गँवार थे और सरकारों ने हमें आजतक वैसा ही रखा भी है। जब कुछ लोग समझदार हो जाते हैं तो वो भी इन्हीं के साथ मिल जाते हैं। सरकारों ने शिक्षा सुधार पर कभी ध्यान इसीलिए नहीं दिया ताकि बेवकूफ बनी रहे जनता और लुटती रहे तथा गुलामी करती रहे। सरकारों ने बस लोकलुभावन योजनाएँ ही लागू की जिससे जनता उलझी रहे उनके तलुवे चाटने में। सब्सिडी बँटती रही ताकि लोग मुफ्त खाने की आदत डाल लें और कर्ज दिया गया कि ये मुफ्तखोर कर्ज में डूबे बंधुआ मजदूर बन कर आकाओं की सेवा करें। जो सरकार कुल जमा टैक्स से अधिक धन मात्र व्यवस्था को चलाने में खर्च कर दे उसमें भी अधिकांश नेताओं और अधिकारियों के ऐशोआराम और सैर सपाटे पर खर्च हो जाय तो देश का भला कैसे संभव है।

आज जो बीएसएफ के जवान का वीडियो चर्चा का केंद्र बना हुआ है यह सब तो शायद आजादी के समय से ही चला आ रहा है। सेना को साजोसामान और अच्छे रहन सहन के लिए धन व सही व्यवस्था मिली होती तो हम चीन के हाथों परास्त न होते न ही पाकिस्तान हम पर आए दिन चढ़ाई करता रहता। यह हमारा सौभाग्य है कि हमारे सैनिक हर दुख सह कर भी अनुशासन में बने रहे और आज भी वे अनुशासित ही हैं। अगर आज किसी जवान ने इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई है तो उसको सरकार धन्यवाद दे और उचित व त्वरित जाँच कर यह अन्याय हमेशा के लिए बंद करे अन्यथा भविष्य बहुत ही गंभीर परिणाम देगा जिसे झेल पाना शायद संभव भी न हो।

बात सिर्फ सेना की नहीं है हर जगह की हर विभाग की है। कहीं भी जब कर्मचारियों पर कोई अत्याचार होता है तो कोई अधिकारी उसका साथ नहीं देता। अधिकारी हमेशा अधिकारी का ही साथ देते हैं जिसके कारण असंतोष बढ़ता है और इसका सीधा असर कार्यक्षमता पर पड़ता है परन्तु किसी अधिकारी को यह चिंता सताती ही कहाँ है क्यों कि वो जिम्मेदार तो ठहराया जाता नहीं और कमाई का अवसर अलग बढ़ता है। कभी जिम्मेदारी की बात आती भी है तो उसका ठीकरा भी मातहत पर फोड़ दिया जाता है। अंततः फँसता कर्मचारी ही है। अतः जबतक व्यवस्था नहीं बदलेगी तबतक कुछ होने वाला नहीं है। सरकार अगर देश की तरक्की चाहती है तो वो अधिकारी कम करके कर्मचारी बढ़ाए और कर्मचारी व अधिकारी दोनों को ही एकदूसरे के प्रति जिम्मेदार बनाए। कर्मचारी गलती करें तो अधिकारी तुरंत कार्रवाई करे और गलत अधिकारी के खिलाफ कर्मचारी की शिकायत पर भी तत्काल सुनवाई व कार्रवाई हो। अगर ऐसी व्यवस्था नहीं होगी तो यहाँ कुछ सुधरनेवाला नहीं ।

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