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भाजपा को संदेश

Posted On: 12 Mar, 2017 में

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चुनाव समाप्त और मतदान के साथ अब मतगणना भी समाप्त तो हार जीत का विश्लेषण अब होगा ही। विश्लेषण नहीं होगा तो आगे की रणनीति कैसे बनेगी। विश्लेषण तो अति आवश्यक है। परन्तु जिस तरह के विश्लेषण हो रहे हैं वो तो लगता है कि एक गर्त से निकाल कर दूसरे में गिरने का का प्रयास भर है।
प्रथम विशलेषण महा विदुषी मायावती जी का आया जिन्होंने सीधे प्रधानमंत्री पर, मुख्यमंत्री पर नहीं, आरोप लगाया की ईवीएम से छेड़छाड़ हुई है।
दूसरा विश्लेषण मुख्यमंत्री के चचा का कि उनकी हार घमंड की हार है न कि समाजवादियों की।
तीसरा सपा कार्यकर्ताओं का कि कांग्रेस से गठबंधन गलत हुआ।
चौथा मुख्यमंत्री ने हार का ठीकरा चुनाव प्रचार की कमी पर फोड़ा और कहा कि हम “इंडिया शाइनिंग” जैसे प्रचार में पड़ गए और अपने काम जनता तक नहीं पहुँचा पाए। ये बच्चा विरासत मे मिली गद्दी की गुदगुदाहट भूल नहीं पा रहा है और क्या बक रहा है शायद उसे खुद कुछ पता नहीं है। सभी के अपने तर्क हैं।
कुछ स्वतंत्र विश्लेषक हैं जो कह रहे हैं कि मोदी विरोधी वोट पचास प्रतिशत है (२२+२२+६ लगभग) तो ये बिहार की तरह एक हो जाते तो क्या होता? बीजेपी की हार निश्चय ही होती।
मैं तो चुनाव की शरुआत से ही भयभीत था कि यूपी भी बिहार जैसी स्थिति में न फँस जाए और यहाँ का सत्यानाश न हो जाए। बिहार का हाल लालू व सुशासन किंग नितीश महान ने क्या कर दिया है दुनिया देख रही है। मैं तो यही समझता हूँ कि संभवतः यूपी की जनता बिहार का उदाहरण दोहराना नहीं चाहती और कोई भी बेमेल गठबंधन यहाँ स्वीकार्य नहीं होता। हो सकता है कि जातिवादी मतदाताओं में से भी कुछ लोग बिखर जाते। यह सपा कांग्रेस के गठबंधन ने दिखा भी दिया है।
लोग यह नहीं समझ पा रहे हैं कि हाथी शहर या गांव में आता है तो लोग देखने आ जाते हैं मजे भी लेते हैं पर उसको बाँधना कोई नहीं चाहता है। दो बछड़े जब कुलाँचे भरते हैं बेमकसद बिना सोचे समझे इधर उधर दौड़ते भागते हैं तो सभी आनंदित होते हैं कुछ तो प्यार से उनपर हाथ भी फेर देते हैं शायद चूम भी लेते हैं परन्तु कोई उन्हें घर नहीं ले जाता बै कोई।
मैं यही सोच रहा था कि यूपी का चुनाव है तो बस जाति धर्म ही मुद्दे रहेंगे परन्तु इस बार शायद ऐसा नहीं हुआ है। कुछ हद तक जाति और धर्म के नाम पर वोट देनेवाले लोग अब देश के लिए वोट करना सीख रहे हैं। मुफ्तखोर लोगों में से भी कुछ की सोच बदल रही है और अब मेहनतकश बनने की तरफ लोग बढ़ रहे हैं। यह सब देश के लिए शुभ संकेत हैं।
यूपी में जातिवादी व सांप्रदायिक ताकतों को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा है यह जरूरी भी था। यह बात अलग है कि कोई इस परिणाम से सबक लेगा या नहीं परन्तु इतना तो तय है कि लोगों को सोचना तो होगा ही कि अब जनता की सोच बदल रही है और उसको बरगला पाना आसान नहीं है। जैसा कि अखिलेश यादव ने कहा कि वो वोटरों को बरगला नहीं पाए तो यह बात उन्होंने क्यों कही यहीं न कि यह मोदी पर व्यंग्य था परन्तु बात यह भी है कि बेशक आधे अधूरे कामों पर वो लोगों को बरगला नहीं पाए और कुकर्म के दाग भी धुल नहीं पाए वरना ऐसी शर्मनाक हार तो नहीं ही होती।
भाजपा तो मदमस्त है ही लेकिन बेहतर होगा कि उसकी यह खुमारी होली के साथ साथ चढ़े ही नहीं उतर भी जाए। जनता ने बहुत बड़ा भरोसा जताया है तो उस भरोसे को बनाए रखे और उस पर खरी उतरे। प्रदेश में कानून व्यवस्था चर्मरायी हुई है जिससे अपराध बढ़ा है और आतंकवाद पनप रहा है। इससे निज़ात पाने के लिए कड़ी शासन व्यवस्था की जरूरत है। शिक्षा का स्तर सुधारने का बीड़ा उठाना किसी के लिए भी चुनौती है परन्तु यह स्वीकार ही नहीं करनी है इसपर अनवरत काम भी करना है। कृषि के लिए भी भगीरथ प्रयासों की जरूरत है। सड़क बिजली पानी यातायात व जनसंख्या की समस्या। यहाँ समस्या ही समस्या है परन्तु प्रचंड बहुमत भी है तो कोई काम असंभव नहीं हो सकता है। केंद्र व राज्य दोनों जगह एक ही पार्टी की सरकार सोने पर सुहागा जैसा ही साबित होना चाहिए।
मुफ्त बाँटना ही हो तो यह ध्यान रखें कि नई व्यवस्था बना कर ऐसा करें। पहले मुफ्त चीजों पर अधिकार उनका हो जिनके एक या ज्यादा से ज्यादा दो ही बच्चे हों। पढ़ाई में जिनके मात्र एक बेटी है उस बेटी की सारी पढ़ाई सरकार अपने जिम्मे लें वो भी पूरी तरह से मुफ्त। सड़क पर दौड़ रही गाड़ियों पर कड़े कानून की जरूरत है। अट्ठारह से कम के बच्चे गाड़ी चला रहे हैं या जो महीने में एक हजार रूपए भी नहीं कमाते वो गाड़ी के मालिक कैसे? क्योंकि यह सब अपराध या सड़क दुर्घटना को बढ़ा रहे हैं।
तो भाजपा के सामने चुनौतियों की भरमार है और उसको इस कसौटी पर खरा उतरना है। यह चुनौती भाजपा को स्वीकार ही नहीं करनी है बल्कि इसपर गंभीरता से काम भी करना है वरना हम फिर से उसी पुरानी व्यवस्था में लौट जाएँगे और यह देशहित में नहीं होगा। मोदी विरोधी प्रदेश को अस्थिर भी करने की कोशिश कर सकते हैं जैसा कि केरल व पश्चिम बंगाल में हो रहा है अतः यह सब रोकने के लिए सरकार को पहले से ही पहल करनी होगी।
हम तो यही कह सकते हैं कि सरकार अपना दायित्व निभाए। कर्तव्यों का निर्वहन करे। जनता सरकार के साथ है हम सब की शुभकामनाएँ सरकार के लिए हमेशा रहेंगी।

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