एक विश्वास

एक विश्वास, दुनिया के बदलने का।

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सब कैसे संतुष्ट होंगे?

Posted On: 30 Apr, 2017 में

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ये कहावत तो आपने भी सुनी ही होगी कि “आधी छोड़ सारी को धावे आधी मिले ………पावे” शायद यह मोदी सरकार पर सौ प्रतिशत सही बैठ रही है।
आज केंद्र की कार्यप्रणाली कुछ ऐसी ही नजर आ रही है। कहते भी हैं और सच भी है कि आप सभी को खुश नहीं कर सकते और आप कुछ भी करें कोई तो असंतुष्ट जरूर ही रह जाएगा। तो सवाल यही है कि मूर्ख सबको नहीं सिर्फ उनको खुश रख जिन्होंने तुझ पर भरोसा किया है और देशहित के कार्य कर क्योंकि जो नाराज हैं उनसे लेना क्या और जो खुश हैं वो तो जहाज के पंछी हैं वो जाएँगे कहाँ? हाँ वो समझदार हैं तो यह मानेंगे ही कि देशहित के लिए कुछ तो न्योछावर करना ही होगा इसलिए असंतुष्ट होकर भी संतुष्ट रहेंगे।
कश्मीर में पत्थरबाजों पर मेहरबानी और नक्सली क्षेत्रों में नक्सलियों से लोहा लेने में भय, आखिर कहाँ गया वो छप्पन इंच जो शायद छब्बीस भी नहीं लग रहा है आज किसीको। आतंकवादियों को संरक्षण देनेवाले आपको प्रिय हैं और जो सेना आपको चैन से बैठने व काम करने का अवसर दे रही है आप उसकी शहादत पर शहादत वो भी जबरदस्ती व अकर्मण्यता की किंकर्तव्यविमूढ़ वाली स्थिति पैदा कर करवा रहे हैं। सच बहुत बेवकूफ हैं सत्ताधारी लोग हमारे देश में जो सोच नहीं पा रहे हैं कि आखिर कब तक प्राणों की बाजी लगाते रहेंगे हमारे भारत माँ के सच्चे सपूत और कब तक मजे मारते रहेंगे गद्दार लोग।
ये नालायकों की राजनैतिक टोली यह क्यों नहीं समझ पा रही है कि सेना का आक्रोश जिस दिन फूट पड़ा उस दिन क्या होगा? सर्वनाश सर्वनाश और बस सर्वनाश।
सरकार जबरदस्ती के और मनमर्जी के ही काम क्यों व किस खुशफहमी या गलतफहमी में कर रही है यह बात भी समझ से परे है। ये लोग क्यों सोचते हैं कि ये मुसलमान को अपना वोट बैंक बना लेंगे। मुसलमान को तो गाय या मोदी में से किसी एक को हलाल करने का मौका मिले तो वो पहले मोदी को हलाल करेगा क्योंकि फिर तो उसका सर्वाधिकार सुरक्षित कर देंगे माया ममता नितीश लालू मुलायम अखिलेश कांग्रेस कम्युनिस्ट आदि और फिर उन्हें आजादी मिल जाएगी किसी को भी हलाल करने की। जो मुसलमान खुद गोधरा काण्ड का दोषी है वो उसी का आरोप मोदी पर लगाने से बाज नहीं आता तो वो मोदी को कैसे वोट देगा यह बात मुझे तो समझ में नहीं ही आती है। जो मूर्ति पूजा का विरोधी होकर भगवान को नमस्कार नहीं कर सकता है पर गड़े सड़े मुर्दों पर बिछी ईंटों पर सिर रगड़ सकता है ऐसे दोहरे चरित्र वाला किसी अन्य का सगा कैसे हो सकता है? जो उस देश को सलाम नहीं कर सकता जो उसे रोटी देता है जो देश को बरबाद करनेवाले को या इनकी पीढ़ियों की पहचान बदल देनेवाले को तो अपना आदर्श मानता है परन्तु सच्चे आदर्शों को ठुकराता है उससे कैसी उम्मीद और क्यों?
तीन तलाक के मुद्दे पर मोदी की राजनीति मुझे सही नहीं लगती है। जो कोर्ट में गए हैं वो वहाँ से फैसला लेंगे। सरकार का क्या काम है इसमें जो बीच में कूदी पड़ी है। मौलाना लोग अपनी रोटी चला रहे हैं तो चलाएँ यह उनका व्यक्तिगत मसला है। वो तलाक दिलवाएँ हलाला करें सरकार को क्या लेना इन बातों से।
कुछ करना है तो घारा ३७० कश्मीर से हटाओ। देश के किसी भी भाग से वहाँ जाकर बसा जा सके ऐसा कानून बनाओ तो कुछ बात बने। पाकिस्तान वालों से कश्मीर की लड़की शादी कर ले तो पाकिस्तानी कश्मीरी हो गया और वहीं कोई कश्मीरी भारत के ही किसी दूसरे राज्य के लड़के से शादी करे तो लड़का तो छोड़िए लड़की भी कश्मीरी नहीं रह जाएगी यह खेल नेहरू खेल के गया है इसको समाप्त करने की हिम्मत दिखाए सरकार तो देश का भला हो परन्तु बात वही कि देशहित चाहता ही कौन है।
मुसलमान जहाँ जिसमें फायदा देखता है वहाँ वही कानून मानने लगता हैं। खुद की बहन को तीन तलाक नाजायज दूसरे की बहन बेटी को खुद दे तो जायज़ और मुल्ला जी सभी में मस्त हैं, कमा के खाके हर तरह से मस्त और बस मस्त। मैं तो कहता हूँ कि यह फैसला मुस्लिम समाज पर छोड़ दें और उनको कहें कि एक माह में तय कर के निर्णय दो कि शरीया कानून चाहिए या फिर संविधान का एक कानून बिना जाति धर्म के भेदभाव वाला। और कट पेस्ट वाला यह संविधान जो उनसे नकल कर बनाया गया है जिनसे हमारी सभ्यता और संस्कृति का कोई मेल ही नहीं है, में भी उचित संशोधन कर दिया जाए। हमें तो वो संविधान चाहिए जो सभी को स्वतंत्र होकर रहने की आजादी दे न कि स्वछंद होकर। जो हर धार्मिक कर्म काण्ड को व्यक्तिगत घोषित करे। कोई भी धार्मिक या राजनैतिक कार्य सार्वजनिक रूप से मनाने की मनाही हो। आम या खास सभी बराबर हों। धर्म या जाति के आधार पर कोई पक्षपात नहीं हो। न्याय व्यवस्था सर्वाधिक चुस्त व दुरुस्त हो।
मोदी एंड कंपनी दो नावों पर पैर रखकर कब तक चल पाएगी यह कह पाना असंभव है लेकिन सफर बहुत लंबा तो नहीं ही हो सकता है।

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