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क्या यही लोकतंत्र है?

Posted On: 10 May, 2017 में

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हमारे नेता लोकतांत्रिक व्यवस्था का बखान करते नहीं थकते हैं जबकि मैं कहता हूँ कि लोकतंत्र हमारे देश के लिए अभिशाप बन चुका है। नेता को तो लोकतंत्र की तारीफ करनी ही चाहिए क्योंकि यह उसकी रोजी रोटी ही नहीं है बल्कि यह उसका पैतृक व्यवसाय है। यह उसके कुकर्म को छिपाने का या उसको अपराध से बचाने और कानूनी कार्रवाइयों से मुक्ति दिलाने का एक अचूक व कारगर हथियार है।
सोचिये कि देश में लोकतंत्र नहीं होता तो गाँधी की तानाशाही कैसे चलती और नेहरू प्रधानमंत्री कैसे बनते? आप भी जानते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र का ही कमाल था कि पंद्रह में से तेरह कांग्रेस कमेटियों का पटेल को प्रधानमंत्री बनाने का फैसला गाँधी ने क्षणभर में ताक पर रख दिया था और देश को एक बदगुमान ऐय्याश पश्चिम से प्रभावित सोच वाले तानाशाह के हवाले कर दिया था।
आज भी बहुमत के करीब वाला सत्ता से बाहर बैठा दिया जाता है और बहुमत से बहुत दूर खड़ा जोड़ तोड़ करके खुद को बादशाह बना लेता है।
यह भी लोकतंत्र का ही कमाल है कि सोनिया व राहुल जो उनकी ही पार्टी के लोगों के द्वारा मजबूरी में ढोए जा रहे हैं और जिनकी हैसियत एक लिपिक के बराबर भी नहीं है देश के करदाताओं के मेहनत के पैसे पर ऐश कर रहे हैं विदेश घूम रहे हैं और शायद देशहित करना तो दूर यह लोग देशहित की बात सोच तक नहीं रहे हैं। इतना ही नहीं ये प्रधानमंत्री बनने का सपना तक संजोए बैठे हैं क्योंकि इनको पता है कि भारतीय लोकतंत्र में बिल्ली के भाग से छींके टूटते ही रहते हैं। इसके जीते जागते उदाहरण हैं अखिलेश यादव और इतिहास में जाइए गुजराल, विश्वनाथ प्रताप या देवगौड़ा। क्या राय है इनके बारे में आप सभी की। मत मानिए आप पर मैं तो यही मानता हूँ कि ये सभी करमजले लोग हमारे लोकतंत्र की गंदगी की ही नाजायज़ पैदाइश थे।
मुलायम और उनके पुत्र हैं जो जाति व संप्रदाय नाम का जहर समाज में घोल कर सत्ता सुख भोग रहे हैं। ये भी प्रधानमंत्री बनना चाह रहे हैं। है न कमाल की बात कि जो सत्ता के लिए छल फरेब करते नहीं थकते हैं जो समाज को सत्ता के लिए बाँटने पर आमादा हैं जो चोरी डकैती बलात्कार करने की छूट कार्यकर्ताओं को देते हैं ताकि वो लोगों को डरा धमका कर वोट दिलवाएँ वो देश के प्रधानमंत्री बनेंगे जरूर बनेंगे क्योंकि उनका सपना यही लोकतंत्र ही तो साकार करेगा। आप को पती होगा कि विदेश से ये कितना ज्ञान लेकर लौटे हैं जिनको यह भी नहीं पता कि लोकतंत्र में कुर्सी पैतृक नहीं होती है। परन्तु इनको पता है कि यह लोकतंत्र भारत का है इसलिए यहाँ तो कुर्सी विरासत की ही वस्तु है। इसीलिए जो जुम्मा जुम्मा आठ दिन भी राजनीति में नहीं रहा वो और मुख्यमंत्री बन गया और जिसने पूरी उम्र खपा दी वो संतरी ही रह गया। यह कैसे हुआ? इसी लोकतंत्र की ही तो बलिहारी है जनाब।
लालू जैसे चारा चोर सत्ता पर काबिज हो जाते हैं कोर्ट के बैन के बावजूद, क्यों? कभी सोचा। सब लोकतंत्र का ही तो प्रसाद है। जहाँ माफिया कानून मंत्री बन सकता है और जमाखोर खाद्य मंत्री तथा जो आतंकियों का मददगार होता है वो मुख्यमंत्री या गृह मंत्री कुछ भी बन सकता है। दिल का मरीज रक्षा मंत्री तो कालेधन का पोषक वित्त मंत्री बन सकता है हमारे जैसे लोकतंत्र में। यहाँ लोकतंत्र है इसलिए वो सब संभव है जो एक सभ्य देश में वर्जित होना चाहिए।
ममता मायावती जया आदि के भ्रष्टाचार के उदाहरण और उनकी लोकप्रियता सब हमारे सामने है जो लोकतंत्र की ही देन है। ममता के राज्य में दो टके का एक इमाम प्रधानमंत्री के लिए फतवा देता है, वो खुलेआम कहता है कि उसका जेहाद जारी है और वो पाकिस्तानी बनना चाहता है। यह सब वो टीवी पर कहता है। वो यहाँ तक कहता है कि वो ब्रिटिश कानून मानेगा परन्तु ममता बनर्जी की औकात नहीं कि उसे गिरफ्तार करवा सके। ये वही ममता बनर्जी है जो एक प्रोफेसर को उसका कार्टून बनाने के लिए गिरफ्तार ही नहीं करवाती है बल्कि उसका उत्पीड़न भी करवाती है। ये वो है जो अपनी महत्वाकांक्षा के लिए अपनी इज्जत दाव पर लगा दे देश को इसके लिए खिलौना है। महज सत्ता सुख व मोदी विरोध के लिए देश तोड़ने की घोषणा करनेवाले को ये गिरफ्तार नहीं करवा रही है। परन्तु इसको नहीं पता कि यह सब बकने वाले इससे भी बड़े गद्दार हैं और ये वो हैं जो अपने खानदान बाप बेटे बेटी के भी नहीं हैं। परन्तु सवाल वही कि यह सब क्यों? देश से गद्दारी क्यो? जवाब वही कि भारतीय लोकतंत्र की वजह से। दूसरी कोई वजह नहीं।
भारत का दुर्भाग्य कि राजतंत्र में राजा उच्छृंखल अय्याश और तानाशाह थे परन्तु लोकतंत्र आया तो जनप्रतिनिधि भी स्वयं को राजा ही समझने लगे। जनप्रतिनिधि ही कानून तोड़ने वाले बनने लगे। जनप्रतिनिधि कानून ही ऐसे बनाने लगे जहाँ वो और उनके लोग बच के निकल जाएँ। जनप्रतिनिधि का चोला पहन जनता को लूटने वाले, अपराधी और माफिया देश को मुट्ठी में बंद कर ऐश करने लगे। लोकतंत्र जनता के गले की फाँसी बन चुका है पर जनता को लोकतंत्र के भ्रष्ट रखवालों के डर से लोकतंत्र जिंदाबाद बोलना पड़ रहा है।
लोकतंत्र अब जोकतंत्र बनकर समाप्त हो चुका है।
अब तो ये लूटतंत्र बन गया है।
यह खानदानी पेशा है।
इसपर महज कुछ कुत्ता या सुअर टाइप आइटमों का काॅपीराइट है।
यह आम जनता के लिए नहीं है।

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