एक विश्वास

एक विश्वास, दुनिया के बदलने का।

130 Posts

66 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 5061 postid : 1330674

कविता

Posted On: 18 May, 2017 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

मैं बिखर रही हूँ
पर लोग हैं,
जो मानते नहीं।
वो कहते हैं,
मैं निखर रही हूँ।
रंग-रूप-यौवन
सब लज्जा से समेटे
और मान-मर्यादा
सबकुछ सहेजे
एक बंद कली सी हूँ, तो
यह चुभता है तुमको?
मेरा खिलना,
बेशर्मी से हिलना डुलाना,
बस यह भाता है तुमको।
आखिर क्यों नहीं तुम,
किसी का सम्मान देख पाते हो?
आखिर क्यों,
तुम किसी की अस्मिता रौंद
कर ही खुश हो पाते हो?
मुझे फूल नहीं बनना है, क्योंकि
तुम्हारी आँखों में
मैंने देखा है,
मेरे माथे पर
चिंता की एक रेखा है।

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

0 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments


topic of the week



latest from jagran