एक विश्वास

एक विश्वास, दुनिया के बदलने का।

133 Posts

68 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 5061 postid : 1331554

कविता

Posted On: 24 May, 2017 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

वो

मेरे सामने से

चुपचाप निकल जाती है।

न हँसती है न मुस्कराती है

बस एक सवाल छोड़ जाती है।

इतराती है, बल खाती है,

बहुत ललचाती है,

मेरा सुख चैन,

मेरा सर्वस्व ही ले जाती है।

और मैं असहाय, अवाक,

हैरान परेशान बेजुबान

बेंचने को तैयार हो जाता हूँ ईमान।

मैं बेईमान नहीं,

किसी बात से अंजान नहीं

परन्तु, वो मुझे

बना देती है गुनहगार।

कर देती है मजबूर

करने को व्यापार

और छा जाता है

मुझ पर एक नशा सा।

मैं निकल पड़ता हूँ

करने को अपराध;

मुझ पर मेरा ही वश नहीं चलता

और फिर

मैं अपराधी बन जाता हूँ।

तेरे आगोश से निकल नहीं पाता हूँ

और तू मुझे निगल लेती है

मेरे देश की तकदीर।

बड़ी बेशर्म सी तू

ऐ मेरे देश की राजनीति।

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

0 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments


topic of the week



latest from jagran